जब माँ काली ने छीन ली राजा विक्रमादित्य के हाथ से तलवार

उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने अपने महलका सारा प्रबन्ध वीर बालकोंको सौंप दिया था। एक दिन राजा महल की छत पर सो रहे थे। आधी रात को उनकी नींद एक स्त्री के रोने की आवाज सुनकर खुल गई। उस समय ‘किशोरसिंह’ नाम का एक क्षत्रिय बालक शरीर-रक्षक (बॉडीगार्ड) के रूप में पहरा दे रहा था। राजा ने उस बालक को स्त्री के रोने का कारण जानने को भेजा। किशोरसिंह अपनी तलवार लेकर गुप्तद्वारसे महलके बाहर निकल गया। राजा भी उस बालक के पीछे-पीछे छिपते हुए चल पड़े।

किशोरसिंह ने देखा कि काली माँ के एक मंदिर में देवांगना के समान सुंदर एक स्त्री बैठी है और आंसू बहाती हुई रो रही है। किशोरसिंह मंदिर में चला गया। राजा विक्रमादित्य मंदिर के पीछे की खिड़की के पास छिपकर भीतर की घटना देखने लगे।

किशोरसिंह द्वारा पूछने पर उस देवी ने बताया, “मैं राज्यलक्ष्मी हूँ। हमारे राजा विक्रमादित्य की आज प्रातः चार बजे अकाल मृत्यु होने वाली है, इसीलिए मैं रो रही हूँ।” यह सुनकर किशोरसिंह व्यथित हो गया। उसने देवी से राजा के जीवन की रक्षा का उपाय पूछा। देवी ने कहा, “यदि कोई अविवाहित व्यक्ति माँ काली के सामने अपनी बलि दे दे, तो राजा के प्राण बच सकते हैं।” इतना कहकर राज्यलक्ष्मी अंतर्धान हो गईं।

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