समर्थ गुरु रामदास के संग हनुमानजी भी जपते थे राम नाम

‘आपने कलियुग में भी तो कुछ महानुभावों पर कृपा की है?’ रघुकुल के बालकों को सम्भवत: शनि की चर्चा में कलियुग का नाम आने से स्मरण आ गया। उन्होंने आग्रहपूर्वक पूछा– ‘अब इस युग में आप कहाँ स्थिर रूप में विराजते हैं।’

मैंने इन बालकों को बतलाना प्रारम्भ किया– अमृत के लिए क्षीराब्धि का मन्थन करते हुए जब सुर और असुर श्रान्त हो गये, स्वयं श्रीहरि ने मन्थन प्रारम्भ किया। वे स्वयं धन्वन्तरि रूप धारण करके सुधा-कलश लिये समुद्र से प्रकट हुए और जब असुरों ने उनके हाथ से वह कलश झपट लिया, तब मोहिनी रूप धारण करके उन्होंने असुरों से अमृत-कलश प्राप्त किया। हाथ में अमृत-कलश को लेकर उसे आनन्दपूर्वक उन मोहिनी रूपधारी श्रीहरि ने देखा तो उनके नेत्र से हर्षाश्रु का एक बिन्दु कलश में गिरा। उस अमृत में पड़े श्रीहरि के अश्रु बिन्दु से एक क्षुप उत्पन्न हुआ, जिसे तुलसी कहा जाता है। भगवान् विष्णु ने उस मूल तुलसी के क्षुप का नाम रंगवल्ली रखा और उसे किंपुरुष वर्ष में रोपित किया। उसी के बीजों से अन्यत्र तुलसी के पौधे उत्पन्न हुए।

सम्पूर्ण पृथ्वी जो बहुत विस्तीर्ण है, जहाँ तक भी पार्थिवत्व हैं, सब पृथ्वी ही हैं, जो कर्मलोक हैं, वह जो जम्बूद्वीप का केवल एक वर्ष–अजनाभवर्ष है; जिसका नाम भगवान् ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर भारतवर्ष हो गया। इसमें भी हिमालय से कन्याकुमारी तक के भाग को जो कि परमपावन भगवदीय भूमि है, भरतखण्ड कहा जाता है। इस भरतखण्ड में ही श्रीहरि अपनी लीला का विस्तार अवतार लेकर करते हैं।

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