जब नारायण मंत्र के जप से खिंची चली आईं लक्ष्मी

दक्षिण में करवीर (वर्तमान कोल्हापुर) के पास ऊर्णा नदी के तटपर एक गाँव में एक ब्राह्मणपरिवार रहता था। दो स्त्रीपुरुष थे और तीसरा एक छोटासा शिशु था। ब्राह्मणवृति से गृहस्थ का निर्वाह होता था। घर में तुलसीजी का पेड़ था, भगवान् शालग्राम की पूजा होती थी। पत्नी आज्ञाकारिणी थी, पति पत्नी की रूचि का आदर करनेवाले थे। दोनों में धार्मिकता थी, अपनेअपने कर्तव् यका ध्यान था और था बहुत ऊँचे हिन्दू आदर्श का अकृत्रिम प्रेम। भगवान् की दया से बच्चा भी हो गया था। दम्पति सुखी थे। परंतु दिन बदलते रहते हैं। सुख का प्रकाशमय दिवस सहसा दुःख की अमानिशा के रूप में परिणत हो जाता है। मनुष्य सोचता है जीवन सुख में ही बीतेगा, ये आनन्द के दिन कभी पूरे होंगे ही। इस प्रेममदिरा का नशा कभी उतरेगा ही नहीं। छके रहेंगे जीवनभर इसी में। परंतु विधाता के विधान से बात बिगड़ जाती है। कितनी आशा से, अन्तस्तल के कितने अनुराग से, हृदय के सुधामय मोहसलिल से जिस जीवनाधार वृक्ष को सींचा जाता है, वही सहसा विच्छिन्न होकर हमारे हृदय के सारे तारों को छिन्नभिन्न कर देता है। जन्ममृत्यु का चक्र चौबीसों घंटे चलता ही रहता है और बड़े स्पष्टभावसे वह घोषणा करता है-‘जीवन क्षणभङ्गुर है, सुख अनित्य है और आशा दु:खपरिणामिनी है!’

गाँवमें एक बार जोरसे हैजा फैला और देखतेहीदेखते प्राणप्रतिमा ब्राह्मणी कालके कराल गालमें चली गयी। ब्राह्मण महान् दु:खी हो गये। मातृहीन शिशुकी भी बुरी अवस्था थी। कुछ दिनों बाद ब्राह्मण भी हैजेके पंजेमें गये और दुधमुँहे नन्हेंसे ढाई सालके बच्चेको छोड़कर बरबस चल बसे। जी बच्चेमें अटका, परंतु मृत्युकी अनिवार्य शक्तिके सामने कुछ भी वश नहीं चला।

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